लहरों और किनारों का प्यार

उठा लहर समंदर में फिर से इक बार,
चाहता था किनारे से मिलने को इस बार।
पूरी कोशिश की फिर से इस बार ,
पर हुआ निराश इस बार जैसे हर बार।
सोचा हम आये लांघ कर मिलो ,
और वो ना बढ़े महज कदम दो-चार।
सोचा सायद उनको लगा होगा,
आया होगा ऐसे ही बेकार।
मन बनाया मिलने की जा कर उस पार,
लेकिन मिली निराशा जैसे हर एक बार।
हो कुछ भी पर ऐसा ही कुछ,
लहरों और किनारो का प्यार।।

~Sandeep Singh

सफलता की उड़ान

अभी तो पंख आये ही है,
सफलता की पूरी उड़ान बाकी है |
सफलता की तो बस अभी कल्पना की है,
उसका हर सफ़र और अंजाम बाकी है |
मेरी मंजिल एक ठिकाना नहीं,
वो तो अगली मंजिल तक जाने का बहाना है |
अभी तो पंख आये ही है,
सफलता की पूरी उड़ान बाकी है |